: 16 राज्य के लिए अलग अलग चाईल्ड लाईन नम्बर जारी
Thu, Aug 31, 2023
1098, चाइल्ड लाइन का यह नंबर भारत सरकार द्वारा प्रत्येक राज्य के प्रत्येक जिलों में एक-एक एनजीओ के माध्यम से अब तक संचालित किया जाता था । जिस पर बच्चों के हित में कोई भी व्यक्ति कॉल कर पहले राज्य, फिर जिला, फिर लोकेशन, बता
कर सहायता तत्काल पा जाता था ।
आज भारत सरकार की महिला बाल विकास मंत्रालय द्वारा, 16 राज्यों के लिए अलग-अलग चाइल्डलाइन नंबर जारी किया गया है ।इसका संचालन अब सरकार द्वारा किया
जाएगा ।
: मधुर वचन और पांच प्रकार के व्यर्थ बोल
Thu, Aug 31, 2023
कहा जाता है कि किसी व्यक्ति के मन में कौन से विचार चल रहे हैं, इसके लिए सही दर्पण होता है उस व्यक्ति के बोल । यदि मन के विचार शुभ भावना और शुभकामनाएं वाले हैं तो बोल भी शक्तिशाली शुद्ध और कल्याणकारी होंगे । जैसे हाथों से श्रेष्ठ कर्म करने से हमारा दुआओं का और पुण्य का खाता जमा होता है, इसी प्रकार से सुखदाई बोल बोलने से भी दुआओं का और पुण्य का खाता जमा होता है। चाहे हम आपस में बातचीत करें या कारोबार के लिए बोले लेकिन बोल को लंबा ना करें क्योंकि जितना कम बोलेंगे उतनी शक्ति जमा होगी।
व्यर्थ
बोल, मोटे तौर पर पांच प्रकार के होते हैं, 1. सीमा से बाहर हंसी मजाक करना 2.ताना मारने के तरीके से बात करना 3.इधर-उधर के समाचार इकट्ठे करके सुनना और सुनाना 4.
ईश्वरी सेवा के समाचार सुनाते हुए भी सेवाधारीयो की कमजोरी का चिंतन करना 5.ऐसे बोल जो युक्ति युक्त नहीं है अर्थात जो सभ्यता के दायरे से बाहर है।
हसीं मजाक केवल वही अच्छा है जिसमें रूहानियत हो और जिससे हंसी मजाक किया जाए उसे आत्मा को फायदा हो, समय सफल हो लेकिन हमने अगर ऐसा हंसी मजाक किया कि किसी को कोई शब्द चुभ गया कोई नाराज हो गया और इतना नाराज हुआ कि उसके मन में बदले की भावना जाग गई तो वास्तव में हमारा समय व्यर्थ ही चला गया।
व्यर्थ बोलने वाला व्यक्ति अपनी बुद्धि में व्यर्थ बातों और व्यर्थ समाचारों का कूड़ा कचरा इकट्ठा करेगा, क्योंकि उसको अपनी कथा को रमणीक रूप देना है, जैसे कई कथाकार होते हैं, कथा को इतना लंबा चौड़ा बनाकर सुनते हैं की मनोरंजन तो थोड़ा बहुत होता है,
लेकिन उसमें सार कुछ भी नहीं होता, इसलिए भगवान कहते हैं जिस समय और जिस स्थान पर जो बोल जरूरी है युक्ति युक्त है अपने और दूसरों दूसरी आत्माओं के लिए लाभदायक है वही बोलो ।
वाणी की बचत की स्कीम बनाओ, जैसे गवर्नमेंट भिन्न-भिन्न विधि से बचत की स्कीम बनती है, ऐसे ही आप भी अपनी वाणी की बचत की स्कीम
बनाओ।
नम्र व्यक्ति के लिए हर एक मन से दुआएं निकलती है, दुआएं पुरुषार्थ में लिफ्ट से भी रॉकेट बन जाती है, कोई कितना भी व्यस्त हो, कठोर दिल हो, क्रोधी हो, लेकिन नम्रता सबका सहयोग दिलाने की निमित बन जाती है।
मधुर बोल हैं सबसे अच्छा मीठा प्रसाद, प्रसाद से मुख मीठा थोड़े समय के लिए होता है, लेकिन अगर हम खुद ही मीठे बन जाए तो सदा
मिठास का अनुभव करते रहेंगे । जैसे मीठा खाने और खिलाने से खुशी होती है, ऐसे ही मधुर बोल खुद को भी खुश करते हैं और दूसरों को भी खुश करते हैं यही है
सबसे अच्छा मीठा प्रसाद।
हम यदि सामने वाले व्यक्ति को उसकी उच्चता, महानता और श्रेष्ठता का
बोध कराए तो वह हर बात में हमारा सहयोगी बन सकता है।
मुख का मौन अर्थात वाणी का संयम, 50 शब्दों की बात पांच शब्दों में बोल देना यह मुख का मौन है।
आंखों का संयम, जिस ओर हमारी दृष्टि जाती है उस ओर हमारी शक्ति प्रवाहित होती है, परदर्शन परचिंतन पतन की जड़ है, अतः परदर्शन से आंखों का संयम रखें, जो परचिंतन से भी बचा लेगा ।
कानों का संयम, जैसे यूनान का सुकरात, जब कोई उसे कुछ बताने आता था तो वह कहता था, रुको, पहले बताओ कि क्या यह बात सत्य है ? क्या यह बात मेरे काम की है ? क्या यह बात सकारात्मक है ? और यदि इनमें से किसी भी प्रश्न का उत्तर "ना" होता, तो वह बात सुनने से मना कर देता था।
पैरों का संयम, चले तो हलके कदमों से की आवाज ना हो जैसे कोई फरिश्ता आहिस्ते से गुजर रहा हो । जीभ का संयम, जीभ का विराम पेट की फैक्ट्री को अवकाश देकर, अंतडियो की सफाई और स्वास्थ्य की बधाई दिलाता है, अर्थात उपवास सबसे बड़ी औषधि है । मन का मौन, जब हम आंखों, कानों, और मुख का मौन रखते हैं तो मन का मौन रखना आसान हो जाता है, मनमनाभव ही मन का मौन है।
: जीवन एक अनंत यात्रा....
Wed, Aug 30, 2023
जीवन एक अनंत यात्रा है । कहने को तो हम कह देते हैं कि कोई मानव पैदा हुआ या कोई मानव मर गया लेकिन
वास्तविकता यह है कि ना कोई मरता है, ना कोई जन्मता है बल्कि यह पांच तत्व का शरीर अपनी अवस्थाएं बदलता है ।
पहले जन्म, फिर शैशव अवस्था, बाल्यावस्था, युवावस्था, वृद्धावस्था तथा अंत में मृत्यु की व्यवस्था है, इसके बाद आत्मा फिर गर्भ में आती है और पुनः वही चक्र शुरू हो जाता है । शरीर को धारण करने वाली आत्मा ना जन्मती है, न मरती है, आत्मा ही यात्री है जो शरीर द्वारा यात्रा करती है।
गर्भावस्था में आत्मा, अपने पिछले जन्मों के कर्मानुसार
शरीर
बुनती है
। वैसे ही उसके अंग प्रत्यंग बनते हैं, इसके बाद बच्चा जन्म लेता है, तो यह अवस्था फूल की तरह कोमल होती है और सबको प्यारी लगती है । युवावस्था में बुरे तथा अच्छे का विवेचन किया जा सकता है । चाहे तो वह सत्कर्म करके सच्चा आत्मिक सुख प्राप्त कर सकता है, चाहे तो कुसंगति में पड़कर, विकर्म करके जीवन को धूमिल वह दुखी बना सकता है। हर अवस्था में मानव कर्म करने में पूर्णतया स्वतंत्र होता है
तथा कर्म करने के बाद फल भोगने के लिए
बाधित हो जाता है।
जब आयु 60 वर्ष के करीब पहुंच जाती है तो बुढ़ापा दस्तक देता है, तब सभी इंद्रियां शिथिल होने लगती है, इंसान पर वश सा हो जाता है। जियो जियो और आयु बढ़ती जाती है त्यों त्यों मानव मृत्यु के नजदीक पहुंचता जाता है। आखिर एक दिन शरीर बिल्कुल जवाब दे जाता है। इसी को ही मृत्यु की अवस्था कह देते हैं, तब आत्मा शरीर से निकल जाती है।मृत्यु के निकट पहुंची आत्मा को, जो भी जीवन काल में अच्छे व बुरे कर्म किए हुए होते हैं, वह याद आने लगते हैं और उसे कुछ पश्चाताप भी होने लगता है लेकिन वह मजबूर होती है
तथा
किए हुए कर्मों अनुसार जहां अपना कर्म भोग
चुकता
करना
होता है, वही जाकर फिर से गर्भ में प्रवेश कर जाती है। फिर वही जीवन चक्र शुरू हो जाता है इस
प्रकार मानव जीवन कभी समाप्त नहीं होता है और ना कभी रुकता है, लगातार चलता ही रहता है।
हम सिर्फ इतना ही कर सकते हैं कि समस्त जीवन काल में हम ऐसे कम करें कि उनका फल हमें दुख के रूप में ना भोगना पड़े। जो भी कर्म हम करते हैं, चाहे अज्ञानता बस, चाहे काम क्रोध, आदि विकारों के वश या किसी के प्रलोभन के वश, अंततः उसका फल इसी जन्म में चाहे अगले किसी भी जन्म में हमें भोगना ही पड़ेगा।
जिस प्रकार एक व्यक्ति एक ट्रेन से उतरकर गंतव्य स्थान पर पहुंचने के लिए दूसरी ट्रेन पकड़ता है, तो अपना सामान तो साथ लेकर ही जाता है, इसी प्रकार कर्म फल ही हमारा सामान है या हमारा बैग
सूटकेस है,
तो सदा ध्यान रहे कि हम अपने बैग सूटकेस में क्या भरा रहे हैं, यदि केवल अच्छे कर्म ही भरेंगे तभी भविष्य जीवन यात्रा, सदा सुखमय, शांतिमय, आनंदमय रह सकती है।
अनेक बार आत्मा ने शरीर लिए और छोड़ें, कितने पुण्य और पाप कर्म किए, कितने महल बनाए, कितना धन इकट्ठा किया तथा और भी क्या कुछ नहीं किया लेकिन साथ कुछ नहीं रहा यदि रहा तो केवल कर्म फल ही साथ रहा,
इसलिए हमें बाकी स्थूल पदार्थों की ओर ध्यान न देकर, केवल कर्मों की स्वच्छता पर ही ध्यान देना चाहिए, यही मानव जीवन की
सफलता है।