विश्व के 90 से अधिक देशों में लगभग 47.6 करोड़ आदिवासी लोग रहते हैं : विश्व आदिवासी दिवस: अधिकार, पहचान और जल-जंगल-जमीन की लड़ाई से आज के विकास तक
Ashwani Kumar Sinha
Sun, Aug 9, 2026
विश्व आदिवासी दिवस: अधिकार, पहचान और जल-जंगल-जमीन की लड़ाई से आज के विकास तक
भोपाल। हर वर्ष 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है। यह दिवस दुनिया के आदिवासी समुदायों की पहचान, संस्कृति, भाषा, परंपराओं, भूमि एवं प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार तथा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक भागीदारी के सवालों को वैश्विक स्तर पर सामने लाने का महत्वपूर्ण अवसर है।
1982 में शुरू हुई अंतरराष्ट्रीय पहल
विश्व आदिवासी दिवस की पृष्ठभूमि 9 अगस्त 1982 से जुड़ी है। इसी दिन जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र के Working Group on Indigenous Populations की पहली बैठक हुई थी। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 23 दिसंबर 1994 को प्रस्ताव संख्या 49/214 के माध्यम से प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को International Day of the World's Indigenous Peoples मनाने का निर्णय लिया। पहली बार यह दिवस 9 अगस्त 1995 को मनाया गया।
इसके पीछे प्रमुख उद्देश्य आदिवासी समुदायों के मानवाधिकारों, मौलिक स्वतंत्रता, सामाजिक-आर्थिक विकास, सांस्कृतिक पहचान, भाषा, परंपराओं और भूमि एवं प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े अधिकारों के प्रति विश्वभर में जागरूकता बढ़ाना था।
वर्ष 2007 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ‘United Nations Declaration on the Rights of Indigenous Peoples’ (UNDRIP) को अपनाकर आदिवासी लोगों के अधिकारों की अंतरराष्ट्रीय मान्यता को और मजबूत किया। इसका मूल भाव न्याय, समानता, गरिमा, भागीदारी और अपनी पहचान एवं संस्कृति के संरक्षण से जुड़ा है।
दुनिया में 47.6 करोड़ से अधिक आदिवासी
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार विश्व के 90 से अधिक देशों में लगभग 47.6 करोड़ आदिवासी लोग रहते हैं। वे करीब 5,000 अलग-अलग समुदायों और संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा दुनिया की लगभग 7,000 भाषाओं में से बड़ी संख्या में भाषाएं आदिवासी समुदायों द्वारा बोली जाती हैं। इसके बावजूद आदिवासी समुदाय आज भी गरीबी, भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार, स्वास्थ्य एवं शिक्षा की असमान पहुंच तथा अपनी पारंपरिक भूमि और संसाधनों पर अधिकार के संकट जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार आदिवासी लोग वैश्विक आबादी का लगभग 6 प्रतिशत हैं, लेकिन दुनिया के अत्यंत गरीब लोगों में उनका हिस्सा करीब 15 प्रतिशत है। यह आंकड़ा बताता है कि विकास की मुख्यधारा में शामिल किए जाने के बावजूद असमानता का अंतर अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
भारत में आदिवासी समाज की स्थिति
भारत में संवैधानिक रूप से अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) को विशेष संरक्षण और अधिकार प्रदान किए गए हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार देश में अनुसूचित जनजातियों की आबादी 10.45 करोड़ थी, जो कुल आबादी का 8.6 प्रतिशत है। केंद्र सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय के अनुसार जनजातीय विकास के सामने दूरस्थ एवं बिखरी हुई बस्तियां, विस्थापन और विकास की असमान पहुंच जैसी चुनौतियां बनी रही हैं।
भारत में शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, स्वच्छता, रोजगार, आधारभूत सुविधाओं और आजीविका के क्षेत्र में अनेक योजनाएं संचालित हैं। इसके बावजूद आदिवासी बहुल क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच, रोजगार के अवसर, कुपोषण, बुनियादी सुविधाओं और भूमि एवं वनाधिकारों के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर लगातार ध्यान देने की आवश्यकता बनी हुई है।
जल-जंगल-जमीन से जुड़ा सवाल आज भी महत्वपूर्ण
आदिवासी समाज के लिए जंगल केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक पहचान का आधार भी है। संयुक्त राष्ट्र भी आदिवासी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान और पर्यावरण संरक्षण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है। दुनिया के अनेक आदिवासी क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं, जलवायु परिवर्तन और संसाधनों पर बढ़ते दबाव के कारण पारंपरिक जीवन-पद्धति प्रभावित हो रही है।
इसलिए विश्व आदिवासी दिवस का उद्देश्य केवल आदिवासी संस्कृति और वेशभूषा का उत्सव मनाना नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाना भी है कि क्या आदिवासी समाज को विकास की प्रक्रिया में समान भागीदारी, निर्णय लेने में प्रभावी भूमिका और अपने अधिकारों की वास्तविक सुरक्षा मिल रही है?
2026 में पारंपरिक ज्ञान और आदिवासी मातृ स्वास्थ्य पर जोर
संयुक्त राष्ट्र ने 2026 के विश्व आदिवासी दिवस के लिए “Honouring Indigenous Midwives: Safeguarding Life and Well-being” विषय निर्धारित किया है। इस वर्ष आदिवासी समुदायों की पारंपरिक स्वास्थ्य-ज्ञान प्रणालियों, विशेषकर पारंपरिक दाइयों की भूमिका, सांस्कृतिक रूप से उपयुक्त स्वास्थ्य सेवाओं और पीढ़ियों से चले आ रहे ज्ञान के संरक्षण पर जोर दिया जा रहा है।
दिवस मनाने की सार्थकता तभी, जब अधिकार जमीन पर दिखें
विश्व आदिवासी दिवस हमें यह याद दिलाता है कि आदिवासी समाज केवल संरक्षण और कल्याण का विषय नहीं, बल्कि अधिकार, सम्मान, समान अवसर और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी का विषय है। शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार के साथ-साथ उनकी भाषा, संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान की रक्षा, भूमि एवं वनाधिकारों का प्रभावी क्रियान्वयन तथा विकास परियोजनाओं में उनकी सार्थक भागीदारी सुनिश्चित करना जरूरी है।
विश्व आदिवासी दिवस की वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी, जब आदिवासी समाज की पहचान और संस्कृति के सम्मान के साथ-साथ उसके अधिकारों, अवसरों और गरिमापूर्ण जीवन की सुरक्षा भी धरातल पर दिखाई दे।
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