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संवेदनशील न्याय की दिशा में कदम : सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश बच्चों से गवाही में सख्ती नहीं, संवेदनशीलता अनिवार्य

Ashwani Kumar Sinha

Sat, Dec 20, 2025

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश

बच्चों से गवाही में सख्ती नहीं, संवेदनशीलता अनिवार्य

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बाल शोषण और यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को अधिक मानवीय और संवेदनशील बनाने पर जोर देते हुए अहम आदेश जारी किया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई बच्चा गवाही के दौरान हर व्यक्ति का सटीक नाम, भूमिका या घटनाओं का क्रम स्पष्ट रूप से नहीं बता पाता है, तो मात्र इसी आधार पर उसकी गवाही को कमजोर नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों और जांच अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि बच्चों से बयान या गवाही लेते समय सामान्य मानवीय संवेदनशीलता और मनोवैज्ञानिक समझ को प्राथमिकता दी जाए। अदालत ने कहा कि पूछताछ की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिससे बच्चे को दोबारा मानसिक आघात (री-ट्रॉमा) न झेलना पड़े।

अदालतों की विशेष जिम्मेदारी

शीर्ष अदालत ने कहा कि बाल एवं शोषण से जुड़े मामलों में अदालतों की भूमिका केवल कानूनी औपचारिकताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वे पीड़िता की गरिमा, सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा करें। बच्चों की उम्र, मानसिक स्थिति, सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि को समझे बिना उनकी गवाही का मूल्यांकन करना न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।

जांच और पूछताछ पर दिशा-निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चों से बार-बार सवाल पूछना, कठोर लहजा अपनाना या तकनीकी त्रुटियों पर अधिक जोर देना न्याय प्रक्रिया को नुकसान पहुंचा सकता है। जांच अधिकारियों और अदालतों को यह ध्यान रखना होगा कि बच्चा भय, दबाव या भ्रम की स्थिति में बयान देता है, इसलिए उसकी अभिव्यक्ति सीमित हो सकती है।

संवेदनशील न्याय की दिशा में कदम

अदालत ने दो टूक कहा कि न्याय पाने की प्रक्रिया स्वयं पीड़ित बच्चे के लिए पीड़ा का कारण नहीं बननी चाहिए। गवाही के दौरान सुरक्षित, भरोसेमंद और सहयोगी वातावरण उपलब्ध कराना अनिवार्य है।

संदेश स्पष्ट

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से यह संदेश साफ है कि बाल न्याय में संवेदनशीलता कोई विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है। बच्चों के मामलों में न्याय केवल सजा तक सीमित नहीं, बल्कि पीड़ित के मानसिक स्वास्थ्य, सम्मान और भविष्य की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।

यह आदेश आने वाले समय में बाल शोषण मामलों की सुनवाई और जांच प्रक्रिया को अधिक मानवीय और प्रभावी बनाने में मील का पत्थर साबित हो सकता है।

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