भारतीय सांस्कृतिक एकता के प्रतीक हैं आदि शंकराचार्य : मातृभाषा के प्रति जागरूकता बढ़ाने का कार्य कर रही
Ashwani Kumar Sinha
Sat, Apr 18, 2026
भारतीय सांस्कृतिक एकता के प्रतीक हैं आदि शंकराचार्य
भोपाल। मातृभाषा मंच द्वारा आदि शंकराचार्य पर केंद्रित एक प्रबोधन कार्यक्रम का आयोजन सुभाष नगर स्थित श्री नारायण गुरु मंदिर में किया गया। कार्यक्रम में मातृभाषा मंच के अध्यक्ष संतोष कुमार राउत तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभाग संघचालक सोमकांत उमालकर विशेष रूप से उपस्थित रहे। मुख्य वक्ता के रूप में अद्वैत वेदांत के विद्वान उमाशंकर पचौरी ने संबोधित किया।
कार्यक्रम की शुरुआत में संयोजक अमिताभ सक्सेना ने मातृभाषा मंच का परिचय देते हुए बताया कि संस्था पिछले 8 वर्षों से भोपाल में विभिन्न भाषायी परिवारों के बीच मातृभाषा के प्रति जागरूकता बढ़ाने का कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि आदि शंकराचार्य की जयंती उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को स्मरण करने का महत्वपूर्ण अवसर है।
मुख्य वक्ता उमाशंकर पचौरी ने अपने उद्बोधन में ‘अहं ब्रह्मास्मि’ महावाक्य की व्याख्या करते हुए कहा कि यह आत्मा और परमात्मा की एकता का बोध कराता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह अहंकार नहीं, बल्कि आत्मज्ञान का सर्वोच्च स्तर है, जो अद्वैत वेदांत की मूल भावना को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म के पुनरुत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अद्वैत वेदांत का प्रतिपादन किया तथा देश के चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना कर सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ किया। साथ ही, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता पर भाष्य लिखकर दर्शन को नई दिशा दी।
पचौरी ने बताया कि आदि शंकराचार्य ने मंदिरों की पूजा-पद्धति में भी ऐसी व्यवस्थाएं स्थापित कीं, जिनसे देश की एकता मजबूत हुई। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों के पुजारियों को अन्य क्षेत्रों के मंदिरों में सेवा का अवसर देकर राष्ट्रीय एकात्मता का संदेश दिया।
कार्यक्रम के अंत में अध्यक्ष संतोष कुमार राउत ने उपस्थित अतिथियों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर विभिन्न भाषायी समाजों के बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।
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