"करो या मरो” का संदेश : भारत छोड़ो आंदोलन : 8 अगस्त 1942 को मुंबई से उठी वह हुंकार, जिसने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी
Ashwani Kumar Sinha
Sat, Aug 8, 2026
भारत छोड़ो आंदोलन : 8 अगस्त 1942 को मुंबई से उठी वह हुंकार, जिसने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी
भोपाल, 8 अगस्त।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 8 अगस्त 1942 का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी दिन मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान (आज का अगस्त क्रांति मैदान) में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) ने भारत छोड़ो प्रस्ताव को स्वीकार किया और महात्मा गांधी ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध निर्णायक जनसंघर्ष का आह्वान किया। इसी अवसर पर गांधीजी ने देशवासियों को अपना प्रसिद्ध मंत्र “करो या मरो” दिया।
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि आंदोलन की शुरुआत “महाराष्ट्र की बैठक” में नहीं, बल्कि तत्कालीन बंबई (मुंबई) में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन में हुई थी। इससे पहले 14 जुलाई 1942 को वर्धा में कांग्रेस कार्यसमिति ने ब्रिटिश शासन से भारत की स्वतंत्रता की मांग करते हुए व्यापक जनसंघर्ष का मार्ग प्रशस्त किया था।
क्रिप्स मिशन की विफलता बनी तत्काल पृष्ठभूमि
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारत को ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं की सहमति के बिना युद्ध में झोंक दिया था। 1942 में ब्रिटिश सरकार के क्रिप्स मिशन के प्रस्ताव भी भारतीय नेतृत्व को संतुष्ट नहीं कर सके। गांधीजी ने इन प्रस्तावों को स्वीकार करने से इनकार किया और कांग्रेस ने ब्रिटिश शासन से तत्काल भारत छोड़ने की मांग तेज कर दी।
8 अगस्त की रात गांधीजी ने अपने ऐतिहासिक संबोधन में स्वतंत्रता के लिए निर्णायक संघर्ष का आह्वान करते हुए “करो या मरो” का संदेश दिया। कांग्रेस का प्रस्ताव मूलतः व्यापक स्तर पर अहिंसक जनसंघर्ष का आह्वान था, लेकिन अगले ही दिन शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन कई स्थानों पर स्वतःस्फूर्त और उग्र रूप भी ले बैठा।
9 अगस्त की सुबह नेतृत्व गिरफ्तार, आंदोलन जनता के हाथ में
भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित होने के कुछ ही घंटों बाद ब्रिटिश सरकार ने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सरदार वल्लभभाई पटेल सहित कांग्रेस के लगभग पूरे शीर्ष नेतृत्व को गिरफ्तार कर लिया। गांधीजी को पुणे के आगा खान पैलेस में नजरबंद रखा गया।
नेताओं की गिरफ्तारी का उद्देश्य आंदोलन को तत्काल समाप्त करना था, लेकिन इसके विपरीत देश के अनेक हिस्सों में जनआक्रोश फैल गया। हड़तालें, जुलूस, प्रदर्शन और सरकारी नीतियों के विरोध का सिलसिला शुरू हुआ। कई स्थानों पर रेलवे, टेलीग्राफ और संचार व्यवस्था को बाधित किया गया तथा सरकारी प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया।
भारत छोड़ो नारा किसने दिया?
एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य यह है कि “Quit India” अर्थात “भारत छोड़ो” नारा महात्मा गांधी ने नहीं गढ़ा था। इसे लोकप्रिय रूप से कांग्रेस समाजवादी नेता और तत्कालीन बंबई के मेयर यूसुफ मेहरअली से जोड़ा जाता है। भारत सरकार के Azadi Ka Amrit Mahotsav के अभिलेख भी मेहरअली को इस नारे से जोड़ते हैं। हालांकि कुछ इतिहासकार इस श्रेय को लेकर सावधानी बरतते हैं और इसे पूर्णतः निर्विवाद तथ्य नहीं मानते।
यूसुफ मेहरअली ने इससे पहले 1928 में साइमन कमीशन के विरोध में “Simon Go Back” नारे को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
आंदोलन के तीन प्रमुख चरण
इतिहासकारों के अध्ययन में भारत छोड़ो आंदोलन को व्यापक रूप से तीन चरणों में समझा जाता है—
पहला चरण—शहरी जनविद्रोह :
अगस्त 1942 के शुरुआती दिनों में देश के अनेक शहरों में हड़तालें, बंद, जुलूस, छात्र आंदोलन और पुलिस-जनता के बीच संघर्ष हुए। ब्रिटिश प्रशासन ने बल प्रयोग और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों के माध्यम से इन्हें दबाने का प्रयास किया।
दूसरा चरण—ग्रामीण विद्रोह और संचार व्यवस्था पर प्रहार :
अगस्त के मध्य से आंदोलन ग्रामीण क्षेत्रों में तेजी से फैलने लगा। बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बंगाल, महाराष्ट्र, ओडिशा और अन्य क्षेत्रों में किसानों तथा स्थानीय जनता ने ब्रिटिश प्रशासन के विरुद्ध विद्रोह किया। रेलवे लाइन, टेलीग्राफ और डाक व्यवस्था जैसी औपनिवेशिक शासन की संचार प्रणालियों को बाधित किया गया।
तीसरा चरण—भूमिगत आंदोलन और समानांतर सरकारें :
सितंबर 1942 के बाद भूमिगत गतिविधियां, गुप्त संगठन, संदेश-प्रसार और कुछ क्षेत्रों में गुरिल्ला शैली का प्रतिरोध अधिक दिखाई दिया। इसी दौर में ब्रिटिश प्रशासन के समानांतर स्थानीय सत्ता संरचनाएं भी उभरीं।
समानांतर सरकारों का ऐतिहासिक प्रयोग
भारत छोड़ो आंदोलन की विशेष उपलब्धियों में कुछ क्षेत्रों में समानांतर सरकारों का गठन भी शामिल था।
महाराष्ट्र के सतारा में नाना पाटील के नेतृत्व में प्रति सरकार (Prati Sarkar) का प्रभाव लंबे समय तक रहा। पश्चिम बंगाल के तामलुक क्षेत्र में तम्रलिप्त जातीय सरकार (Tamralipta Jatiya Sarkar) गठित हुई, जिसने प्रशासन, न्याय, राहत और जनसुरक्षा जैसी गतिविधियों को संचालित किया। ओडिशा के तालचेर में भी समानांतर शासन की कोशिश हुई।
उत्तर प्रदेश के बलिया में चित्तू पांडे के नेतृत्व में अगस्त 1942 में अल्पकालिक समानांतर सरकार स्थापित हुई। 19 अगस्त को प्रशासन का नियंत्रण स्थानीय नेतृत्व को हस्तांतरित हुआ, हालांकि कुछ ही दिनों में ब्रिटिश सेना ने वहां पुनः नियंत्रण स्थापित कर लिया।
बिहार का दरभंगा क्षेत्र भी आंदोलन के महत्वपूर्ण केंद्रों में रहा। वहां पुलिस थानों और डाकघरों पर जनता के नियंत्रण, रेलवे व टेलीग्राफ व्यवस्था को बाधित करने तथा कुछ स्थानों पर स्थानीय स्वशासन के प्रयोग के प्रमाण मिलते हैं।
सुभाषचंद्र बोस की भूमिका को लेकर आवश्यक ऐतिहासिक स्पष्टता
भारत छोड़ो आंदोलन के प्रमुख नेताओं की सूची में सुभाषचंद्र बोस को सीधे शामिल करना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं है। वे 1942 में भारत से बाहर थे और आजाद हिंद फौज (INA) के माध्यम से ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष कर रहे थे। इसलिए उनका स्वतंत्रता संग्राम में योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण होने के बावजूद, उसे भारत छोड़ो आंदोलन के प्रत्यक्ष नेतृत्व से अलग करके देखना चाहिए।
भारत छोड़ो आंदोलन के प्रमुख कांग्रेस नेताओं में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद, अरुणा आसफ अली, राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, उषा मेहता और सुचेता कृपलानी सहित अनेक नेता और कार्यकर्ता शामिल थे। शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी के बाद भूमिगत आंदोलन को आगे बढ़ाने में अरुणा आसफ अली, राम मनोहर लोहिया और उषा मेहता जैसे कार्यकर्ताओं की भूमिका उल्लेखनीय रही।
सभी राजनीतिक दलों ने आंदोलन का समर्थन नहीं किया
यह कहना भी अधिक सटीक होगा कि भारत छोड़ो आंदोलन को देश के व्यापक जनसमुदाय और कांग्रेस के नेतृत्व में व्यापक समर्थन मिला, लेकिन सभी राजनीतिक संगठनों ने इसका समर्थन नहीं किया।
तत्कालीन मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा ने कांग्रेस के भारत छोड़ो आंदोलन का समर्थन नहीं किया। इसी प्रकार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भी उस समय आंदोलन का समर्थन नहीं किया। इसलिए “पूरे देश के सभी नेताओं का समर्थन” कहना ऐतिहासिक रूप से अतिशयोक्तिपूर्ण होगा।
भारत छोड़ो आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व
भारत छोड़ो आंदोलन तत्काल स्वतंत्रता प्राप्त नहीं कर सका और ब्रिटिश सरकार ने इसे कठोर दमन से दबा दिया। हजारों लोग गिरफ्तार हुए और अनेक स्थानों पर पुलिस तथा सेना की कार्रवाई में लोग मारे गए। फिर भी इस आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि ब्रिटिश शासन को भारत में लंबे समय तक बनाए रखना आसान नहीं था।
इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि शीर्ष कांग्रेस नेतृत्व की गिरफ्तारी के बावजूद जनता ने स्वयं आंदोलन को आगे बढ़ाया। शहरों की हड़तालों से लेकर गांवों के विद्रोह, भूमिगत रेडियो और गुप्त गतिविधियों से लेकर समानांतर सरकारों तक—1942 का आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में व्यापक जनभागीदारी और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध निर्णायक असंतोष का प्रतीक बन गया।
8 अगस्त 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन इसलिए केवल एक राजनीतिक प्रस्ताव नहीं था, बल्कि वह स्वतंत्रता के लिए भारतीय जनता के निर्णायक संकल्प का ऐतिहासिक क्षण था।
— अगस्त क्रांति दिवस पर स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानियों को विनम्र श्रद्धांजलि।
तथ्य-जांच के आधार पर सबसे महत्वपूर्ण सुधार: “भारत छोड़ो” नारे का श्रेय यूसुफ मेहरअली को दिया जाता है, लेकिन इसे निर्विवाद तथ्य की तरह लिखने के बजाय “लोकप्रिय रूप से श्रेय दिया जाता है” ।
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