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अग्रिम जमानत से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन : सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: अग्रिम जमानत खारिज करते समय आरोपी को सरेंडर करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता

Ashwani Kumar Sinha

Mon, Apr 27, 2026

सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: अग्रिम जमानत खारिज करते समय आरोपी को सरेंडर करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता

नई दिल्ली, 26 अप्रैल 2026 — सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) खारिज करते समय अदालत आरोपी को सरेंडर करने का निर्देश नहीं दे सकती। कोर्ट ने कहा कि ऐसा निर्देश देना न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की खंडपीठ झारखंड से जुड़े एक मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें याचिकाकर्ता पर धोखाधड़ी और जालसाजी के आरोप लगे थे। यह याचिका झारखंड हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए आरोपी को ट्रायल कोर्ट में सरेंडर कर नियमित जमानत लेने का निर्देश दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, “अदालत अग्रिम जमानत खारिज कर सकती है, लेकिन वह आरोपी को सरेंडर करने के लिए बाध्य नहीं कर सकती।” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक प्रक्रिया में सामान्यतः समन जारी किया जाता है और आरोपी को केवल अदालत के समक्ष उपस्थित होकर कार्यवाही में भाग लेना होता है।

अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 87 का हवाला देते हुए कहा कि वारंट तभी जारी किया जा सकता है, जब यह मानने के पर्याप्त आधार हों कि आरोपी फरार हो सकता है या समन का पालन नहीं करेगा। केवल अग्रिम जमानत खारिज होने के आधार पर सरेंडर का निर्देश देना उचित नहीं है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि शिकायत आधारित मामलों में, जब तक अदालत गैर-जमानती वारंट जारी नहीं करती, पुलिस को आरोपी को गिरफ्तार करने का अधिकार नहीं होता। यहां तक कि CrPC की धारा 202 के तहत जांच के दौरान भी पुलिस सीधे गिरफ्तारी नहीं कर सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से बिहार और झारखंड में अग्रिम जमानत याचिकाओं के दुरुपयोग पर चिंता जताई और कहा कि अनावश्यक रूप से ऐसी याचिकाएं दायर होने से मामले बेवजह सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच रहे हैं।

मामले की परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया और आदेश की प्रति बिहार एवं झारखंड हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजने का निर्देश दिया, ताकि इसे संबंधित मुख्य न्यायाधीशों के संज्ञान में लाया जा सके।

प्रकरण का नाम: Om Prakash Chhawnika @ Om Prakash Chabnika v. State of Jharkhand & Anr.

यह फैसला आपराधिक न्याय प्रणाली में अग्रिम जमानत से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करता है।

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