सरल और सहज भाषा में लिखी गई यह नाटिका सभी आयु वर्ग के पाठकों के : अहिल्या रूपेण संस्थिता’ लोकमाता के जीवन-दर्शन का जीवंत दस्तावेज : गिरीश उपाध्याय
Ashwani Kumar Sinha
Sun, May 31, 2026
‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ लोकमाता के जीवन-दर्शन का जीवंत दस्तावेज : गिरीश उपाध्याय
भोपाल। लोकमाता पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होल्कर के जीवन, व्यक्तित्व और राष्ट्रदृष्टि पर आधारित लघु नाटिका पुस्तक ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ के विमोचन एवं परिचर्चा कार्यक्रम में वक्ताओं ने इसे लोकमाता के जीवन-दर्शन का जीवंत दस्तावेज बताया। कार्यक्रम का शुभारंभ भारत माता एवं देवी अहिल्याबाई होल्कर के चित्र पर पुष्पार्चन तथा दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।
पुस्तक की लेखिका एवं निराला सृजन पीठ की निदेशक डॉ. साधना बलवटे ने बताया कि पुस्तक का शीर्षक देवी आराधना के प्रसिद्ध श्लोक “या देवी सर्वभूतेषु...” से प्रेरित है। उन्होंने कहा कि अहिल्याबाई होल्कर के जीवन में शक्ति, बुद्धि, करुणा, मातृत्व और लोककल्याण के सभी गुणों का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। उन्होंने बताया कि यह कृति मूल रूप से उपन्यास की अवधारणा थी, जिसे व्यापक जनसंपर्क और मंचीय प्रस्तुति को ध्यान में रखते हुए नाटिका का स्वरूप दिया गया।
मुख्य अतिथि डॉ. लोकेंद्र सिंह ने कहा कि सनातन संस्कृति में मानव धर्म सर्वोपरि है और अहिल्याबाई होल्कर का संपूर्ण जीवन धर्म, न्याय और लोककल्याण के लिए समर्पित रहा। उन्होंने कहा कि त्याग, तपस्या, समर्पण और अनुशासन जैसे मूल्यों को उन्होंने अपने जीवन में चरितार्थ किया, जिससे वे आज भी प्रेरणास्रोत बनी हुई हैं।
मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार गिरीश उपाध्याय ने कहा कि ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ केवल एक नाटिका नहीं, बल्कि लोकमाता के संपूर्ण जीवन, संघर्ष, प्रशासनिक दक्षता, सामाजिक सुधार और राष्ट्रचेतना का सजीव दस्तावेज है। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी तक ऐसे आदर्श चरित्रों को पहुंचाने के लिए इस नाटक का अधिकाधिक मंचन होना चाहिए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्व संवाद केंद्र के अध्यक्ष लोजपत आहुजा ने कहा कि भारतीय परंपरा केवल विरासत का हस्तांतरण नहीं, बल्कि उसके सतत संवर्धन की प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि डॉ. साधना बलवटे की यह कृति उसी परंपरा को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण प्रयास है। उन्होंने अहिल्याबाई होल्कर के सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक योगदान का उल्लेख करते हुए महेश्वर में वस्त्र उद्योग, महिला सशक्तिकरण और तीर्थस्थलों के पुनर्निर्माण में उनकी भूमिका को रेखांकित किया।

वक्ताओं ने कहा कि पुस्तक में महिला शिक्षा, स्त्री सेना के गठन, विधवा अधिकार, कृषि एवं हस्तशिल्प प्रोत्साहन, न्यायप्रिय शासन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण जैसे विषयों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है। सरल और सहज भाषा में लिखी गई यह नाटिका सभी आयु वर्ग के पाठकों के लिए प्रेरणादायी है।
कार्यक्रम का संचालन नैवेद्य पुरोहित ने किया तथा आभार प्रदर्शन रोहन गिरि ने व्यक्त किया।
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