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क्या MRP और “Discount” के नाम पर ग्राहकों के साथ खेल हो रहा है? : देश में ऐसा कोई कानून नहीं है जो कंपनियों को हर उत्पाद की निर्माण लागत सार्वजनिक रूप से पैकेट पर लिखने के लिए बाध्य करे

Ashwani Kumar Sinha

Wed, May 13, 2026

क्या MRP और “Discount” के नाम पर ग्राहकों के साथ खेल हो रहा है?

संसद में भी उठ चुके हैं सवाल, सरकार ने क्या जवाब दिया?

भारत में जब भी कोई ग्राहक बाजार से सामान, कपड़े, कॉस्मेटिक या दवा खरीदता है, तो सबसे पहले पैकेट पर छपी MRP देखकर “Discount” का हिसाब लगाता है।

लेकिन वर्षों से यह सवाल उठता रहा है कि क्या कंपनियों को मनमानी MRP छापने की खुली छूट है? और क्या “70% OFF” जैसे ऑफर वास्तव में ग्राहकों को भ्रमित करते हैं?

इस विषय पर लोकसभा और राज्यसभा में कई बार चर्चा और प्रश्न उठ चुके हैं। केंद्र सरकार ने भी अलग-अलग समय पर जवाब दिए हैं।

MRP क्या होती है?

भारत में MRP यानी Maximum Retail Price वह अधिकतम कीमत है, जिससे अधिक पर कोई दुकानदार सामान नहीं बेच सकता।

यह व्यवस्था Legal Metrology (Packaged Commodities) Rules, 2011 के तहत लागू है। सरकार के अनुसार MRP में सभी टैक्स शामिल होते हैं।

लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि अधिकांश उत्पादों में MRP कंपनी स्वयं तय करती है। सरकार हर सामान की कीमत तय नहीं करती।

संसद में क्या सवाल उठे?

संसद में कई सांसदों ने दवाओं, मेडिकल उपकरणों और पैकेज्ड वस्तुओं की कीमतों को लेकर सवाल उठाए।

सरकार ने जवाब में कहा कि:

पैकेट पर MRP लिखना अनिवार्य है।

MRP से अधिक वसूली गैरकानूनी है।

मेडिकल उपकरणों पर भी MRP छापना जरूरी किया गया।

इसके अलावा दवाओं के मामले में सरकार ने बताया कि आवश्यक दवाओं की कीमतें नियंत्रित करने के लिए National Pharmaceutical Pricing Authority (NPPA) काम करता है।

सबसे बड़ा सवाल: क्या कंपनियाँ मनमानी MRP छाप सकती हैं?

यही वह बिंदु है जिस पर उपभोक्ता संगठनों और कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चिंता जताई है।

उदाहरण के लिए:

कोई वस्तु ₹20–30 में तैयार होती है,

उस पर ₹199 MRP छाप दी जाती है,

फिर “50% Discount” देकर ₹99 में बेची जाती है।

ग्राहक को लगता है कि उसे भारी छूट मिली, जबकि वास्तविक लागत और विक्रय मूल्य में भारी अंतर बना रहता है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि “Discount आधारित मार्केटिंग” में कई बार MRP को जानबूझकर ऊँचा रखा जाता है ताकि छूट बड़ी दिखाई दे सके।

दवाओं में स्थिति अलग क्यों है?

दवाओं में स्थिति थोड़ी अलग है क्योंकि कई आवश्यक दवाओं की कीमतें सरकार नियंत्रित करती है।

Drugs (Prices Control) Order, 2013 के तहत कुछ दवाओं की Ceiling Price तय की जाती है।

यानी हर दवा कंपनी पूरी तरह मनमानी नहीं कर सकती।

फिर भी गैर-नियंत्रित दवाओं और कई हेल्थ उत्पादों में कीमतों को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

क्या “Manufacturing Cost” लिखना अनिवार्य होना चाहिए?

सोशल मीडिया और उपभोक्ता मंचों पर लगातार यह मांग उठ रही है कि पैकेट पर केवल MRP नहीं बल्कि:

निर्माण लागत (Manufacturing Cost)

थोक मूल्य (Wholesale Price)

वास्तविक खुदरा मूल्य (Retail Margin सहित)

भी लिखा जाए।

हालांकि वर्तमान भारतीय कानून में ऐसा अनिवार्य नहीं है।

सरकार केवल MRP, निर्माण तिथि, वजन, मात्रा, ग्राहक हेल्पलाइन जैसी जानकारी अनिवार्य करती है।

ग्राहकों को क्या करना चाहिए?

उपभोक्ता विशेषज्ञों के अनुसार:

केवल “Discount” देखकर सामान न खरीदें।

अलग-अलग दुकानों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर कीमत तुलना करें।

दवाओं में Generic विकल्प पूछें।

MRP से अधिक वसूली होने पर शिकायत करें।

“Buy 1 Get 1” और “70% OFF” जैसे ऑफर का वास्तविक मूल्य जांचें।

भारत में MRP व्यवस्था ग्राहकों को अधिकतम कीमत से सुरक्षा देती है, लेकिन यह भी सच है कि अधिकांश वस्तुओं में प्रारंभिक MRP तय करने की शक्ति कंपनियों के पास होती है।

इसी कारण “Discount Culture” पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।

संसद में भी यह मुद्दा अलग-अलग रूपों में उठ चुका है, खासकर दवाओं और मेडिकल उत्पादों को लेकर।

लेकिन अभी तक ऐसा कोई कानून नहीं है जो कंपनियों को हर उत्पाद की निर्माण लागत सार्वजनिक रूप से पैकेट पर लिखने के लिए बाध्य करे।

इसलिए जागरूक ग्राहक बनना ही सबसे बड़ी सुरक्षा है।

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