संतों, धर्माचार्यों, विचारकों और समाज के विभिन्न वर्गों को एक साथ : हिंदू समाज के संगठन और सेवा के संकल्प के साथ 62 वर्ष का हुआ विश्व हिंदू परिषद
Ashwani Kumar Sinha
Fri, Sep 4, 2026
हिंदू समाज के संगठन और सेवा के संकल्प के साथ 62 वर्ष का हुआ विश्व हिंदू परिषद
भोपाल। विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने 29 अगस्त 2026 को अपनी स्थापना के 62 वर्ष पूर्ण कर लिए। परिषद की स्थापना 29 अगस्त 1964 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन मुंबई स्थित सांदीपनी साधनालय में संतों, धर्माचार्यों, विचारकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की बैठक में हुई थी। बैठक में स्वामी चिन्मयानंद जी को परिषद का कार्यवाहक अध्यक्ष तथा एस.एस. आप्टे को महासचिव बनाया गया था।
क्यों पड़ी आवश्यकता
विहिप की स्थापना के पीछे मूल विचार था कि विभिन्न मत-पंथ, संप्रदाय, भाषा, क्षेत्र और सामाजिक विभाजनों के कारण कमजोर हुई हिंदू समाज की एकता और संगठन को मजबूत किया जाए। इसके लिए एक ऐसा गैर-राजनीतिक मंच बनाने की आवश्यकता महसूस की गई, जिस पर संतों, धर्माचार्यों, विचारकों और समाज के विभिन्न वर्गों को एक साथ लाया जा सके।
तीन मूल उद्देश्य
स्थापना के समय परिषद के तीन प्रमुख उद्देश्य निर्धारित किए गए—
हिंदू समाज को संगठित एवं सुदृढ़ करना।
आधुनिक समय के अनुरूप हिंदू धर्म के नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों तथा जीवन-दृष्टि का विश्वभर में प्रसार करना।
विदेशों में रहने वाले हिंदुओं से संपर्क स्थापित कर उनके सहयोग और हितों के लिए कार्य करना।
1966 में मिला व्यापक स्वरूप
स्थापना के बाद जनवरी 1966 में प्रयाग में कुंभ के अवसर पर विश्व हिंदू सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें विभिन्न संप्रदायों के धर्माचार्यों तथा देश-विदेश से आए प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसी सम्मेलन के माध्यम से परिषद को व्यापक संगठनात्मक स्वरूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया।
संगठन के साथ सेवा को महत्व
समय के साथ विहिप ने अपने कार्यों में सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक समरसता, स्वावलंबन और ग्राम विकास जैसे क्षेत्रों को भी प्रमुखता दी। परिषद की आधिकारिक जानकारी के अनुसार वर्तमान में 4,277 से अधिक सेवा परियोजनाएं संचालित की जा रही हैं। परिषद सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन और समाज में आत्मीयता तथा समरसता बढ़ाने को भी अपने कार्यों का हिस्सा बताती है।
62 वर्षों की यात्रा में स्थापना दिवस विहिप के लिए केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि संगठन, सेवा, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक चेतना और समाज के प्रति दायित्व को आगे बढ़ाने के संकल्प का दिन है।
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