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: ध्यान करने की विधि

Admin

Mon, Jun 10, 2024
ध्यान करने की विधि उषाकाल या संध्या काल ध्यान के लिये अधिक उपयुक्त होते हैं क्योंकि इस समय सुषुमना नाड़ी चलती है ! ध्यान जितना ही प्रगाढ़ होता है, शरीर उतना ही सुन्दर, स्वस्थ और आनंदमय बनता है ! कल्पना में मन में प्रकाश का एक बिन्दू देखते रहें ! इस बिन्दू को भगवान मान कर कहते रहें ! आप शांति के सागर हैं ! आप शांति के सागर हैं ! आप चलते फिरते भी अपने सामने बिन्दू को देखते रहें ! आप अपने इष्ट को भी देख सकते हैं ! उसे यही कहना है आप शांति के सागर हैं , शांति के सागर हैं या आप प्यार के सागर हैं, प्यार के सागर हैं ! यही अभ्यास हर परिस्थिति में करना है ! सिद्वि ध्यान में सिद्वि तब प्राप्त होती है जब हमारे भीतर सूक्ष्म शरीर में स्थित चक्र खुल जाते हैं ! ध्यान तथा अन्य योगिक क्रियाओं के द्वारा इन चक्रों को खोला जाता है ! सहस्त्रार चक्र मन बुद्वि और परमात्म प्राप्ति का द्वार है ! सिर के उपर बिन्दू रूप का भी अभ्यास करें अध्यात्मिक दृष्टि से उत्तम मन की सीमाओं को तोड़कर बाहर निकलने के लिये व्यक्ति अपने लिये जिस पथ का निर्माण करता है उसे हम ध्यान कहते हैं ! प्राय मन ऐसी चीजों के बारे में नही सोचता जो वास्तव में महत्वपूर्ण होती हैं ! इसलिये ध्यान करने के लिये ऐसे विषय अथवा वस्तु का चयन करना चाहिए, जो अध्यात्मिक दृष्टि से महतवपूर्ण हो, वह कोई दिव्य पुरुष अथवा वस्तु होनी चाहिए या कोई अध्यात्मिक उत्कृष्ट प्रसंग अथवा सत्यता होनी चाहिए ! मन को न केवल दिव्य विषयों अथवा सत्यताओं में रूचि रखनी चाहिए बल्कि उसे उनको समझने एवं उनकी सराहना करने के प्रयास से ध्यान आरम्भ करना चाहिए !

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