: मानसिक बल ( संकल्प )
Admin
Fri, Jun 7, 2024
-मानसिक बल -संकल्प
-प्रकृति ने मनुष्य शरीर की संचालन व्यवस्था इस प्रकार बना रखी है कि शरीर का प्रत्येक कोश 80 दिनो के बाद पुराना हो कर मैल के रुप में मर कर उसी प्रकार बाहर निकल जाता है । जिस प्रकार समुद्री लहरों में निरंतर ज्वारभाटे से समुन्द्र की गंदगी तटों पर इकट्ठी होती रहती है ।
-मनुष्य अपने विचार नए कर ले और चरित्र को ऊंचा उठा ले, तो अपना शरीर ही बदल सकता है ।
-प्रेम, मैत्री, दया, करुणा और परोपकारी विचारो को धारण कर कोई भी इसका लाभ ले सकता है ।
-मुँह व सिर की रक्त नालियां तथा मांसपेशीया भावनाओ के अनुसार फैलती और सिकुड़ती हैं और प्रतिक्रिया करती है ।
- अस्वस्थ भावनायें विभिन्न शारीरिक रोगो का कारण बनती हैं । साधारण सिर दर्द से ले कर माइग्रेन तक के दर्द, भावनात्मक तनाव से होता है । तनाव से सिर की नसें सिकुड़ती हैं जिस से सिर दर्द होता हैं ।
-भोजन के बाद कलेजे पर बोझ सा आ जाना और भोजन नीचे सरक ही नही रहा, ये सब तनाव के कारण हैं । अधिक तनाव होने पर उबकाई आने लगती है, जी मिचलाने लगता है, डकारे आना, पेट मे ऐंठन होना, पेट मे वायु बनना, त्वचा विकार, एग्जीमा, खुजली आदि भावनात्मक तनाव है ।
-कमर दर्द का कारण भी भावनात्मक तनाव है ।
-कठोरता, क्रोध, बात बात में लड़ बैठना, झगड़ालूपन, ये कमजोरी के प्रतीक हैं । मन की कुटिलता और अनैतिक कर्म ही रोग का आधार है ।
-स्नेह, करुणा और व्यापक भाई भाई की भावना से इन रोगॊ को मिटाना सम्भव है ।
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