: जेनरिक दवाइया को सस्ती है, नकली हैं कह कर बदनाम कर रखा है।
Admin
Wed, Oct 2, 2024
आमतौर पर जेनेरिक दवाइयां को प्राइवेट अधिकतर डॉक्टर नकली कहकर बदनाम कर रहे हैं ,और अपने ही निजी मेडिकल पर बिकने वाली अधिकतर दवाइयां जेनेरिक है, जो वह लिखते हैं, वह ब्रांड दूसरी जगह नहीं मिलती, मजबूरी में भगवान कहे जाने वाले डॉक्टर की दुकान से ही 50 से 90% कम मिलने वाली दवाइयां उनके यहां से मजबूरी में एमआरपी पर लेना पड़ती है डॉक्टर दवाइयां का ब्रांड लिखते हैं, ड्रग नहीं ,
जबकि भारत सरकार और प्रदेश सरकारों द्वारा स्पष्ट आदेश दिए गए हैं कि, किसी भी कंपनी के ब्रांड को प्रिस्क्रिप्शन में ना लिखा जाए, सिर्फ कौन सा ड्रग (दवाई) है वही लिखी जाए, लेकिन कमिशन ,माफियाओं के मकड जाल की वजह से मरिज एवं मरीज के रिश्तेदार को मजबूरी में वही दवाइयां को लेना पड़ता हैं ,जो डॉक्टर लिखता है, भले ही उनके काउंटर पर जेनेरिक दवाइयां क्यों ना हो । मिलती एमआरपी पर ही है ।
जिसका परिणाम गरीबी में गिला आटा ,आर्थिक रूप संपन्न नागरिक को कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन गरीबों को जब ₹20 की दवाई 100 में खरीदना पड़ती है, तो उसका तो बजट बिगड़ता ही है, और जेनेरिक दवाइयां का जन औषधि सेंटर का, मध्य गरीब वर्ग को लाभ ही नहीं मिल रहा ,जन औषधि केंद्र को प्राइवेट डॉक्टरों ने एवं मेडिकल माफिया बदनाम जो कर रखा है ,सस्ती है ,नकली है, अतः मरिज डॉक्टर को आमतौर पर भगवान मानता है ,उसकी बात मानकर वही दवाइयां लेने के लिए मजबूर हो जाते हैं ,जो डॉक्टर ने लिखी है ,और उन्हीं की रिटेल शॉप से मिलती है ।
लगभग सभी दवाइयां अंग्रेजी में लिखी हुई होती है, जिसे लोग समझ ही नहीं पाते, एमआरपी एवं एक्सपायरी बारीक अक्षरों में लिखा जाता है, जिसके पढ़ने के लिए अतिरिक्त लेंस की आवश्यकता पड़ती है जिस फोंट साइज में दवाई का नाम रहता है ,उसी साइज के अक्षरों में एक्सपायरी एवं एमआरपी लिखी जाना चाहिए । वास्तविकता में जेनेरिक दवाई का लाभ आम नागरिकों को मिलने के लिए एमआरपी ही कम की जाए या पहचान के लिए एक नीला पट्टा या कोई संकेत स्पष्ट होना चाहिए कि, देखते ही यह समझ जाए कि, यह दवाई जेनेरिक है ,जेनेरिक दवाई की पहचान न होने के कारण आमतौर पर नागरिक एमआरपी पर लेने के लिए मजबूर है। और प्रधानमंत्री का मूल उद्देश्य दवाइयां सस्ती उपभोक्ताओं को जन औषधि केंड्रो के माध्यम से मिलने का उद्देश्य अधूरा है , या यूं कह सकते हैं की ,जेनेरिक दवाइयां उपभोक्ता तक पहुंचने का उद्देश्य मेडिकल माफिया असफल कर रहे है ।
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