जिसने “एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान – नहीं चलेंगे” : डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी,भारत माता के एक निर्भीक सपूत को नमन
Ashwani Kumar Sinha
Sun, Jul 6, 2025
📰 डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जयंती पर विशेष समाचार
📅 6 जुलाई – भारत माता के एक निर्भीक सपूत को नमन
✍️ जिसने “एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान – नहीं चलेंगे” का उद्घोष किया
भोपाल, 6 जुलाई – आज हम श्रद्धा के साथ स्मरण कर रहे हैं डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी को, जो एक दूरदर्शी विचारक, शिक्षाविद्, राष्ट्रवादी राजनेता और सच्चे अर्थों में भारत माता के निर्भीक सपूत थे। वे ऐसे महान पुरुष थे जिनकी कई बातें आज भी जनमानस को प्रेरित करती हैं, परंतु उनके जीवन के कई अनछुए पहलू आज भी लोगों की जानकारी से परे हैं।
🌟 उनकी कुछ प्रेरणादायक व कम ज्ञात बातें:
1. 🧠 भारत के सबसे युवा कुलपति
डॉ. मुखर्जी मात्र 33 वर्ष की उम्र में कोलकाता विश्वविद्यालय के कुलपति (Vice-Chancellor) बनाए गए थे।
उन्होंने इस पद पर रहते हुए रवींद्रनाथ टैगोर को विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में आमंत्रित किया, जिससे विश्वविद्यालय का गौरव बढ़ा।
2. 📚 पाँच डिग्रियाँ, एक साथ
उन्होंने अंग्रेज़ी, बंगाली, दर्शनशास्त्र, इतिहास और कानून – इन पाँच विषयों में डिग्रियाँ प्राप्त कीं।
कैंब्रिज विश्वविद्यालय से First Class में पास होने के बाद वे इंग्लैंड की Lincoln’s Inn से सबसे कम उम्र में बैरिस्टर बने।
3. 🛑 नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने वाले पहले व्यक्ति
वे पंडित नेहरू के पहले मंत्रिमंडल में उद्योग व आपूर्ति मंत्री रहे।
परंतु कश्मीर नीति में मतभेद के चलते उन्होंने 1950 में मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया – यह आजादी के बाद का पहला बड़ा वैचारिक विरोध था।
4. 🗣️ कश्मीर पर सबसे पहला निर्णायक संघर्ष
जब जम्मू-कश्मीर में "दो निशान, दो प्रधान" की नीति थी, डॉ. मुखर्जी ने “एक देश में दो विधान नहीं चलेंगे” का नारा देते हुए कश्मीर में प्रवेश का आंदोलन चलाया।
उन्होंने बिना परमिट के कश्मीर में प्रवेश किया और सरकार द्वारा गिरफ्तार किए गए।
23 जून 1953 को जेल में रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई — जिसे आज भी राजनीतिक षड्यंत्र की दृष्टि से देखा जाता है।
5. 🛕 जनसंघ की स्थापना: आज के भाजपा की नींव
1951 में उन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना की, जो आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी (भा.ज.पा.) बनी।
उनका विचार था कि भारत की आत्मा “संस्कृति, राष्ट्रवाद और अखंडता” में बसती है।
6. 💬 स्वतंत्र विचार, राष्ट्र सर्वोपरि
वे संसद में सदा तर्क और राष्ट्रहित की आवाज़ थे। उन्होंने कहा था:
“अगर राष्ट्र की एकता खतरे में हो, तो मैं सत्ता छोड़ दूंगा, पर समझौता नहीं करूंगा।”
📌 उनके विचार आज के लिए क्यों प्रासंगिक हैं?
जब आज भी कश्मीर, देश की अखंडता, शिक्षा, और युवाओं के मुद्दे चर्चा में हैं – डॉ. मुखर्जी के विचार और योगदान अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं।
वे न केवल आलोचक थे, बल्कि वैकल्पिक दिशा देने वाले विचारक भी थे।
🙏 स्मरण का संकल्प
आज जब हम उन्हें नमन करते हैं, तो केवल श्रद्धा से नहीं – एक संकल्प से करें कि:
"राष्ट्र की एकता, शिक्षा की गुणवत्ता और नीतियों की दृढ़ता" को सर्वोपरि रखते हुए हम समाज निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाएँ।
🚩 डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी – एक विचार, एक चेतना, एक युगद्रष्टा
📍 भारत की एकता का स्थायी प्रहरी
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